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मेरी प्रथम पाठशाला...

छाँह नीम की तेरा आँचल,

वाणी तेरी वेद ऋचाएँ।

सव्यसाची कैसे हम तुम बिन,

जीवन पथ को सहज बनाएँ।।

कोख में अपनी हमें बसाके,

तापस-सा सम्मान दिया।।

पीड़ा सह के जनम दिया- माँ,

साँसों का वरदान दिया।।

प्रसव-वेदना सहने वाली, कैसे तेरा कर्ज़ चुकाएँ।।

ममतामयी, त्याग की प्रतिमा-

ओ निर्माणी जीवन की।

तुम बिन किससे कहूँ व्यथा मैं-

अपने इस बेसुध मन की।।

माँ बिन कोई नहीं,

सक्षम है करुणा रस का ज्ञान कराएँ।

तीली-तीली जोड़ के तुमने

अक्षर जो सिखलाएँ थे।।

वो अक्षर भाषा में बदलें

तीली तीली जोडके तुमने

आखिर आखर गठन सिखाए

नई कहानी रोज सुनाके

भावों आँगन के हरियाए

मेरी प्रथम पाठशाला हम कहो कहाँ

अब पडने जाएं?

- गिरीश बिल्लौरे

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