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मैंने उन्हें नंगा देख लिया है : अशोक चक्रधर |
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आगरा (भारत) (मीडियाभारती सिंडीकेशन सर्विस) 11 नवंबर : केंद्रीय हिंदी संस्थान के नवनियुक्त उपाध्यक्ष प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर का यह साक्षात्कार हिंदीदुनिया.कॉम पर प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत हैं इस साक्षात्कार के संपादित अंश... अशोक जी, केंद्रीय हिन्दी संस्थान के आप उपाध्यक्ष नियुक्त हुए हैं। ये नई जिम्मेदारी कितनी चुनौती भरी है? देखिए, जीवन में आप अगर इच्छा रखते हैं और लक्ष्य तक पहुंचना चाहते हैं तो हर कार्य चुनौती से भरा है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान एक ऐसा बड़ा मंच है, जहां अगर प्रपंच नहीं है तो वैश्विक स्तर पर हिन्दी को स्थापित करने के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। हिन्दी संस्थान मंडल का गठन हुआ तो कुछ प्रमुख उद्देश्य थे। इनमें पहला था हिन्दी के शिक्षण को सुधारना। दूसरा, हिन्दी का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार करना। तीसरा, हिन्दी के उन्नयन के जुटे लोगों को प्रोत्साहित करना और पुरस्कृत करना। चौथा, ऐसे प्रकाशन करना जो शोधपूर्ण हों और शोध को बढ़ावा देना। पांचवा, दृश्य श्रव्य माध्यम का उपयोग करते हुए हिन्दी को दुनिया से परीचित कराना। छठा, भाषाई स्वरूप को विकसित करना। इसका अर्थ ये कि भाषा संस्कार विकसित करना जो आपके लिए नहीं बल्कि दूसरे देशों के लोगों के लिए हैं। अभी केंद्रीय हिन्दी संस्थान के कुल आठ केंद्र हैं जिनमें ज्यादातर पूर्वोत्तर में हैं। एक अहमदाबाद में है। हिन्दी भाषी इलाकों में सिर्फ आगरा और दिल्ली में है। संस्थान के तमाम उद्देश्यों की पूर्ति के अलावा मैं चाहूंगा कि हिन्दी भाषी बाकी राज्यों चाहे वो राजस्थान हो या मध्य प्रदेश, वहां भी केंद्र खुलें ताकि भाषायी संस्कारों का इनपुट बढ़े। हिन्दी जहां नए रूपों, लोक बोलियों में मुखरित हो रही है, वहां से इनपुट मिले ताकि हिन्दी को समृद्ध किया जा सके। आप कंप्यूटर और सूचना तकनीक के महारथियों में हैं। माइक्रोसॉफ्ट से आपको कई बार पुरस्कृत किया गया। आपने देश का पहला ई-कवि सम्मेलन कराया। केंद्रीय हिन्दी संस्थान अभी सूचना तकनीक का खास इस्तेमाल नहीं करता। इसके लिए कुछ योजनाएं हैं? ऐसा नहीं है कि केंद्रीय हिन्दी संस्थान से नई तकनीक नहीं जुड़ी है। मैंने वहां भाषा लैब देखी है। बहुत बड़ी है। उन्हें इस्तेमाल करने वालों में कितनी गुणवत्ता है, मैं अभी नहीं जानता। मैंने जब 90 के दशक में कंप्यूटर सीखा, तब कंप्यूटर को दोस्त बनाना पड़ता था। कई तकनीकी समस्याएं थी। मैं अपने बेटे का आभारी हूं जिसके कंप्यूटर सीखने की ललक ने धीरे-धीरे मुझे भी प्रेरित किया। फिर, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का एक वाक्य भी मुझे याद रहा कि कंप्यूटर भविष्य में जीवन के हर क्षेत्र को समृद्ध बनाएगा। उस वक्त मेरे साथी कवि उनकी इस दृष्टि को कंप्यूटर की टर्र टर्र हो रही है जैसी कविताएं कहकर व्यंग्य का विषय बनाते थे। खैर, आज कंप्यूटर सीखना मुश्किल नहीं है और मैं चाहूंगा कि केंद्रीय हिन्दी संस्थान सूचना तकनीक का बखूबी इस्तेमाल करे। मेरा लक्ष्य होगा कि यहां एक बहुत बड़ा ई-पुस्तकालय बने। जहां तक कॉपीराइट का मसला नहीं आता, वो सभी पुस्तकें इस पुस्तकालय में उपलब्ध हों, चाहें वो किसी भी विषय की हों। आज अंग्रेजी में कुछ भी सर्च करो, चुटकियों में हाजिर है। मेरी कोशिश हिन्दी में यही करने की होगी। मुझे ये मानने में संकोच नहीं है कि हिन्दी में अभी ज्ञानोत्पादक सामग्री नहीं है। इसी कमी को पूरा करना है। विदेशी कंपनियां हमारी जरूरतों को जानती हैं, तभी तो रोमन में हिन्दी की सुविधा गूगल ने दी। हालांकि, लोगों से कहो कि रोमन में ही सही हिन्दी लिखना संभव हुआ है, तो हिन्दी के कठमुल्ला मजाक उड़ाएंगे। लेकिन, मेरा कहना है कि पहले हिन्दी सीखने की ललक तो लोगों में हो। वो हिन्दी में पढ़ना तो चाहें। हिन्दी का की बोर्ड है लेकिन बाजार में ही नहीं मिलता। उसकी मांग नहीं है। हिन्दी के लिए केंद्रीय हिन्दी संस्थान जैसे संस्थानों को जो काम करने चाहिएं वो गूगल जैसी कंपनियां कर रही हैं। हिन्दी अकादमी का उपाध्यक्ष बनने के बाद काफी विवाद हुआ। अब आपको केंद्रीय हिन्दी संस्थान का उपाध्यक्ष बनाया गया है। क्या आपको भय लगता है कि फिर विवाद न हो या आप बेपरवाह हैं? पहली बात तो ये कि जो पद मुझे दिए गए हैं, मैं और मेरे अंदर का ईश्वर जानता है कि मैंने उनके लिए प्रयत्न नहीं किया। मुझे आदरणीय शीला जी और कपिल जी के यहां से प्रस्ताव आया जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। इसका मतलब ये कि जिन्होंने मुझे चुना, मुझसे खफा लोग उनसे सवाल करें कि आपने गलत आदमी को क्यों चुना। हिन्दी अकादमी के विवाद में आए उबाल के बाद झाग छंटने लगा है और दूध दिखने लगा है यानी दूध फटा नहीं है। मेरे आने के बाद हिन्दी अकादमी में जितने कार्यक्रम हुए आंकड़ेबाज लोग उनके बारे में बताएं। हिन्द स्वराज से लेकर कबीर पर सेमीनार और नौटंकी की अहमियत तक पर कार्यक्रम हुए। मैं आपको बताऊं कि ये दोनों मानद पद हैं और इसके लिए मुझे कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता। हां, चंद सुविधाएं हैं लेकिन वो इतनी बड़ी नहीं। मेरा विरोध करने वालों में कई ऐसे लोग थे जिनके साथ मैंने बहुत काम किया। रामशरण जोशी ने मुझे विदूषक कह दिया। मैं नहीं जानता कि उन्होंने क्यों कहा। लेकिन मुझे दुख होता है क्योंकि ये सब लोग मुझे जानते हैं। मैंने मुक्तिबोध पर पीएचडी की, दो किताबें लिखीं। कई समीक्षाएं कीं। कविता में कोई बताए कि मेरी कविता में अश्लीलता, फूहड़ता है या धर्मनिरपेक्षता की खिलाफत। मेरी कविताएं सामाजिक सरोकार से जुड़ी रहीं। फिर विवाद की वजह क्या रही? मैं खुद हैरान हूं। मुझे पहले मौका देते, फिर कहते। मुक्तिबोध की कविता है- मैंने उन्हें नंगा देख लिया, इसकी मुझे सजा मिलेगी। मंचीय कविता को लेकर आपका क्या कहना है? देखिए, मैं किसी को मंचीय कविता या साहित्यिक कविता नहीं मानता। जो भी काम गंभीरता से किया जाए, उसे मैं गंभीर कर्म मानता हूं। हां, कवि सम्मेलनों में पढ़ी जाने वाली कविता का स्तर बहुत खराब हुआ है, इसमें संदेह नहीं है। लेकिन,जब कोई संस्था अपने निकृष्टतम स्तर तक पहुंच जाती है तभी उसका उत्थान शुरू होता है। मंच की कविता का भी यही हाल है। यहां भी अच्छे लोग आएंगे। अमिताभ बच्चन और प्रसून जोशी मिलकर कवि सम्मेलन करना चाहते हैं। उनकी कुछ ऐसी योजना है। मेरे पास भी फोन आया था उनका। और आप देखिएगा कि अगर ऐसा हुआ तो मंच की कविता की लोकप्रियता भी छलांग भरेगी और उसका स्तर भी सुधरेगा। आपने शुरुआत गंभीर साहित्यिक कविताओं से की थी लेकिन आप मंच के कवि कैसे बन गए। ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्योंकि आप आलोचना के घेरे में इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि आप मंच के कवि हैं? शुरुआती दौर में जब मैं गंभीर स्थापित समीक्षक हो रहा था तब अचानक कवि सम्मेलनों का सिलसिला शुरू हुआ। मद्रास में एक कवि सम्मेलन हुआ। मैंने वहां कविता पढ़ी...बूढ़े बच्चे...। तंग गलियों में रहने वाले बच्चों के जीवन पर आधारित इस कविता को मैंने अपने सहज हास्य बोध के साथ पढ़ा तो लोगों ने बहुत सराहा। बहुत प्यार दिया। बस, तभी मेरा मंच की कविता को लेकर पूर्वाग्रह छूट गए। क्योंकि उस वक्त हम जो वामपंथी क्रांति करना चाहते थे, समझ आया कि वो कौन करेगा... जनता न...। समझ आया कि जनता को मंच की कविता के जरिए एक झटके में जोड़ा जा सकता है। निश्चित तौर पर नाटकीय कौशल काम आया। चुनौतियां अलग हैं। खैर, पहले कवि सम्मेलन के खत्म होते ही कई प्रस्ताव मिले और लोगों की सराहना मेरा उत्साह बढ़ाती गई। आजकल क्या कर रहे हैं आप? एक उपन्यास पूरा कर रहा हूं। नवसाक्षरों के लिए 10 किताबों के संग्रह में पांच आ चुकी हैं, बाकी पर काम चल रहा है। समीक्षा पर दो पुस्तकें हैं। लेकिन, अब कवि सम्मेलन कम कर रहा हूं। तो क्या अब आपके ई-कवि सम्मेलन ही दिखाई देंगे। आखिर, पहला ई-कवि सम्मेलन आपने ही किया था? ई-कवि सम्मेलनों का भविष्य उज्ज्वल है। पॉडकास्टिंग की नई तकनीक आने के बाद हिन्दी का प्रचार प्रसार का ये जरिया भी है। मैं सूचना तकनीक के सभी माध्यमों का इस्तेमाल कर हिन्दी को स्थापित करने में जुटा हूं, लिहाजा ई-कवि सम्मेलन भी दिखाई देंगे ही। |
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