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अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर उच्च शिक्षा का प्रभाव |
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ऋषि दीक्षित प्रबंधकीय शिक्षा में आया बदलाव विदेशी विपणन और औद्योगिक विकास का मुख्य आधार कहा जा सकता है। प्रबंधकीय क्षेत्र में उच्च शिक्षा के महत्व को रेखांकित करने से पहले यहां यह बताना भी आवश्यक है कि आज हम जिस उच्च शिक्षा की बात कर रहे हैं वह क्या है? और इसके क्या फायदे हैं? यूं तो विभिन्न देशों में अनगिनत ऐसे शैक्षणिक संस्थान हैं जो नई पीढ़ी को किताबी ज्ञान के साथ-साथ पुराने अनुभवों से राह दिखा रहे हैं लेकिन कुछ प्रयोगवादी ऐसे विद्वान हैं जो अपनी विद्या से कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। इन विद्वानों में भारत के गिने-चुने उच्च शिक्षाविद् हैं। हालांकि, भूमण्डलीकरण के दौर में सीमाओं का बंधन नहीं रहा है। कहीं भी रहकर कुछ भी किया जा सकता है। अपनी पहचान और राष्ट्र की पहचान बनाने के लिए यह जरूरी है कि कुछ अनूठा किया जाए और ये तभी हो सकता है जब आप अपने क्षेत्र में पारंगत हों। उदाहरण के तौर पर देश-विदेशों में धाक जमा चुके भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में से एक भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (आईआईएफटी) के प्रबंधन विकास कार्यक्रम दक्षिण अफ्रीकी देशों के साथ-साथ अब विकसित देशों में भी अपनाए जा रहे हैं। यही नहीं, यहां के प्रोफेसर डॉ. राकेश मोहन जोशी द्वारा `इण्टरनेशनल बिजनस’ पर लिखी गई किताब भी लंदन में सबसे ज्यादा बिकने वाली 50 किताबों में शामिल हो गई है। आजादी के बाद भारत में समय-समय पर उच्च शिक्षा का खाका तैयार किया जाता रहा है लेकिन बीते दशक में जो उपलब्धि हासिल हुई है वह इससे पहले नहीं हो पाई थी। इसकी वजह है देश में उच्च शिक्षा का बढ़ता महत्व और सुधरता स्तर। यह सौ फीसदी सच है ईसा पूर्व जनसंख्या की दृष्टि से भारत अव्वल था। आंकड़े बताते हैं दुनिया के 32.5 फीसदी लोग भारत में निवास करते थे। इसी प्रकार, पड़ौसी देश चीन में 25.8 फीसदी। इटली, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और जापान जैसे देश तो अस्तित्व में ही नहीं थे। इन देशों की जनसंख्या बहुत कम थी। विदेशी व्यापार का मुख्य केन्द्र था भारत। इस दौरान भारत की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ थी। विश्व की विकास दर में 32.9 फीसदी हिस्सा भारत का था। यह सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश भारत का इतिहास है और अब फिर एक बार इसी इतिहास को दोहराने की राह हमारा इंतजार कर रही है। अपने समृद्ध इतिहास को हथियार बनाकर हम कोई भी जंग जीत सकते हैं बशर्ते हम वर्तमान के साथ-साथ अतीत का भी ध्यान रखें। समय के साथ-साथ विद्याएं और व्यापारिक परंपराएं भी बदलती रही हैं लेकिन किसी भी क्षेत्र में सांस्कृतिक विरासत के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। वैश्विक व्यापार के संचालन में भी अहम भूमिका अदा करती है संस्कृति। खान-पान की बस्तुएं यहां तक कि परम्परागत वस्त्रों का भी अन्तरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा रहा है। इसीलिए सांस्कृतिक महत्व को हमें समझकर ही व्यापारिक नीतियों का निर्धारण करना होगा। उदाहरण के रूप में चीन के खाद्य पदार्थों, औषधियों को देखा जा सकता है। बिना सांस्कृतिक आदान-प्रदान के भूण्डलीकरण की अवधारणा को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता। अतीत को भूलकर वर्तमान और भविष्य का ध्यान रखना उच्च शिक्षा के मापदण्डों को पूरा नहीं कर सकता है। सांस्कृतिक विरासत को संजोकर अन्तरराष्ट्रीय व्यापार को दिया गया बढ़ावा ही अर्थव्यवस्था की मजबूती को स्थायित्व प्रदान कर सकता है। प्रथम विश्व युद्ध के पहले वर्ष 1870 से 1914 तक अन्तरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी सहारा लेकर कई यूरोपीय देशों ने आर्थिक सामंजस्य कायम कर लिया था। खासतौर से यूरोपीय देशों के यातायात और संचार माध्यमों में अग्रणी होने के कारण उन्हें इसका लाभ मिला था। 18वीं सदी के मध्य में भारत से कपड़े और कच्चे रेशम का निर्यात यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर किया जाता था। चीन से भी चाय का निर्यात यूरोपीय देशों में होता था। उस समय भारत से होने वाले उपभोक्ता वस्तुओं के निर्यात में ईस्ट इंडिया कम्पनी का एकाधिकार था। लेकिन, आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच में तो अन्तराराष्ट्रीय व्यापार में आने वाली सभी रुकावटें लगभग खत्म होती गईं। हम अपनी संस्कृति को दुनिया में फैलाने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं। हमारी संस्कृति का प्रचार-प्रसार अब यूरोपीय देशों में आकर्षण पैदा कर रहा है। बीते दो दशकों की तुलना में यदि पर्यटन की दृष्टि से ही मूल्यांकन किया जाए तो अकेले प्रेम की प्रतीक इमारत ताजमहल को देखने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में सौ फीसदी वृद्धि हुई है। इस वृद्धि के पीछे भूमण्डलीकरण और संचार माध्यम ही नहीं हमारी बदलती जीवन शैली भी है। समय के साथ कदमताल के महत्व को समझने के कारण ही ऐशियाई देशों में भारत आज अग्रणी है। यदि संस्कृति के नाम पर हम रूढ़िवादी नजरिया नहीं छोड़ते तो हमारी स्थिति भी आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान या फिर बांग्लादेश जैसी होती। एक समय था जब शिक्षा की कमी के कारण देश के पिछड़े क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को व्यापार में जोखिम उठाना पड़ता था लेकिन अब ऐसा नहीं रहा है अब वे व्यापार की बारीकियों को समझने लगे हैं। |
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