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आर्थिक, व्यापारिक दृष्टि से बेहतर होगा साल 2010’

भारतीय विदेश व्यापार संस्थान नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. राकेश मोहन जोशी अन्तरराष्ट्रीय व्यापार जगत में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके हैं। डॉ. जोशी की इंटरनेशनल बिजनेस और इंटरनेशनल मार्केटिंग पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तकें दुनियाभर में देश का झण्डा बुलंद कर रही हैं। इंटरनेशनल बिजनेस पर लिखी गई किताब तो लंदन की सबसे ज्यादा बिकने वाली 50 किताबों में शामिल हो गई है। यही नहीं, लंदन बिजनेस स्कूल ने डॉ. जोशी की एक केस स्टडी को भी चुना है। मंदी के दौर से उबर रही दुनिया के लिए आर्थिक और व्यापारिक रूप से कैसा होगा वर्ष 2010 और कैसी रहेगी भारत की स्थितिभारत में  व्यापारिक और आर्थिक विकास की संभावनाओं पर ऋषि दीक्षित ने डॉ. जोशी से बात की

व्यापारिक और आर्थिक विकास में अव्वल बनने के लिए किस तरह की योजनाएं बनानी होंगी? क्या बीते वर्ष में किए गए प्रयास ही अग्रणी देशों को मात देने के लिए काफी हैं?

उत्तर-व्यापारिक और आर्थिक विकास में अव्वल बनने के लिए सबसे पहले बाजार की जरूरत को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। साथ ही अग्रणी देशों की योजनाओं और उनके व्यापार सम्बन्धी नियम-कानूनों को ध्यान में रखते हुए आगे के फैसले करने होंगे। अभी तक व्यापारिक और आर्थिक विकास की जो योजनाएं बनी हैं वे नाकाफी हैं। आगे बढ़ने के लिए समय-समय पर जरूरत के हिसाब से बदलाव करने होंगे तभी हम लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। हमें ब्राण्ड्स तैयार करने होंगे। बिना ब्राण्ड्स तैयार किए हम बाजार में विदेश कम्पनी को टक्कर नहीं दे सकते। उदाहरण के रूप में हम सौन्दर्य प्रशाधनों को ले सकते हैं। आज हमारे लकमे जैसे देशी उत्पादों को विदेशी रेवलान मात दे रहा है। ऐसा नहीं है कि रेवलान लकमे से बेहतर है सिर्फ ब्राण्डिंग का खेल है। लोग लकमे को छोड़कर रेवलान को पसन्द कर रहे हैं।

भूमण्डलीकरण के दौर में व्यापारिक और आर्थिक विकास के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? उत्पादकता और क्वालिटी में किसको प्रमुखता दी जानी चाहिए?

उत्पादों की गुणवत्ता को ही सुधारना जरूरी है। हमारे उत्पादों की गुणवत्ता जब तक पूरी तरह से वैश्विक बाजार के अनुरूप नहीं होगी तब तक हम अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाएंगे। मांग के अनुरूप समय पर उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर ध्यान देकर ही बाजार में पहचान बनाई जा सकती है। भूमण्डलीकरण के दौर में गुणवत्ता पर ध्यान देकर ही व्यापार को बढ़ाया जा सकता है। हालांकि वर्ष 2009 की तुलना में आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से वर्ष 2010 फलदायी होगा।

पड़ोसी देश चीन की प्रतिद्वंदिता को ध्यान में रखते हुए व्यापारिक नीतियों में बदलाव कहां तक उचित है?

चीन की तुलना में हम बहुत पीछे हैं। विश्व के किसी भी देश में चले जाइए वहां के बाजार चीनी उत्पादों से पटे प़ड़े हैं। इसकी वजह है चीन का तकनीकी रूप से अग्रणी होना और वहां के लोगों का कर्मठ और कार्य के प्रति ईमानदार होना। हमें आगे बढ़ने के लिए पारदर्शिता पर भी ध्यान देना होगा। भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हुए हम आर्थिक और व्यापारिक विकास में अपनी जगह नहीं बना सकते हैं।

आयात-निर्यात नियमों में किस तरह का बदलाव होना चाहिए जिससे अन्तरराष्ट्रीय बाजार में व्यापार को बढ़ावा मिल सके?

सबसे पहली बात आयात-निर्यात नियमों के सरलीकरण की है। साथ ही हमें आयात-निर्यात के लिए संसाधनों में इजाफा करना होगा। सुख-सुविधाओं का भी विकास करना होगा। आज हमारे पास खाड़ी देशों की  तुलना में अच्छे हवाई अड्डे नहीं हैं। कंटेनर सुविधाएं नहीं हैं। नियमों के सरलीकरण के साथ-साथ हमें बंदरगाहों हवाई अड्डों का विकास भी करना होगा जिससे कि उत्पादों के आयात-निर्यात में परेशानी का सामना न करना पड़े।

बीते दशक में व्यापारिक और आर्थिक वृद्धि को किस रूप में देखते हैं? क्या ये भूण्डलीकरण का परिणाम है या निजी प्रयासों का नतीजा हैं?

निश्चित रूप से प्रभावी प्रगति हुई है लेकिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के देश में आने के बाद प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है। हमारी कई देशी कम्पनियां बंद हो गई हैं। हमें अपने परम्परागत देशी उत्पादों की ब्रांण्डिग करनी होगी और उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयास करने होंगे। आजकल उत्पाद बहुत कुछ मार्केटिंग पर निर्भर करता है। भूण्डलीकरण के दौर में जितनी मेहनत हम बाजार में अपने उत्पादों को पहचान दिलाने में करलेंगे उतना ही हमें फायदा मिलेगा और हमारी स्थिति में सुधार होगा।

वैश्विक बाजार के वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए देश से किन-किन उत्पादों का निर्यात देश को व्यापारिक और आर्थिक बढ़ावा दे सकता है?

व्यापारिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए आईटी, औषधि निर्माणदेशी वनस्पतियों से बने सौन्दर्य उत्पादों का निर्यात विकास के और रास्ते खोल सकता है। साथ ही तकनीकी रूप से दक्ष मैनपावर का भी हम सही उपयोग कर व्यापारिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा दे सकते हैं।

विदेश व्यापार में उच्च शिक्षा के महत्व को प्रमुखता दी जानी चाहिए या नहीं। या फिर किसी तरह के बदलाव की जरूरत है?

शिक्षा एक ऐसा विषय है जिसके महत्व को किसी भी क्षेत्र में नकारा नहीं जा सकता है। हालांकि शिक्षा के क्षेत्र में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं और कहा जा सकता है कि हमारे देश ने शिक्षा के बलबूते ही विकास की राह पकड़ी है। जरूरत के अनुरूप चाहे वह व्यापारिक क्षेत्र हो या फिर आर्थिक, बदलाव होते रहने चाहिए। किसी भी क्षेत्र में बदलाव से गतिशीलता बनी रहती है। गतिशीलता ही विकास का मूलमंत्र कहा जा सकता है।

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