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ठण्ड ने बदल दिया परिन्दों का व्यवहार |
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ऋषि दीक्षित उत्तर भारत में इस बार सर्दी का मौसम मानव जाति के लिए ही दुष्कर नहीं रहा बल्कि पक्षियों पर भी कहर बन कर टूटा। लगातार कड़ाके की ठण्ड और कोहरे से बड़ी संख्या में पक्षियों की मौत हुई है। यही नहीं, उनके व्यवाहर में भी बदलाव आया। ठंड के कारण भोर होते ही चहकने वाली चिड़ियों की चूं-चूं बंद हो गई। दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में स्थायी रूप से निवास करने वाले पक्षियों में गौरैया, काली चिड़िया, कबूतर, तोता, कौआ, नीलकंठ सहित पक्षियों की कई प्रजातियां शीतलहर का शिकार हुईं। एक अध्ययन के अनुसार इस बार उत्तर भारत में प्राकृति के प्रकोप से बड़ी संख्या में पक्षियों की कई प्रजातियां कालकवलित हुई हैं, जो चिंता का विषय है। ज्यादा-गर्मी और सर्दी से बचने के लिए मानव तो उपाय कर लेता है लेकिन क्षेत्रीय पक्षियों के लिए यह मुश्किल होता है। एक अनुमान के अनुसार इस बार सर्दी से पक्षियों की संख्या दस फीसदी कम हो गई। दिल्ली जैसे बड़े शहर में ही हर रोज हलवाई की दुकानों पर गिरने वाली झूठन को चुगने वाली काली चिड़िया (गलगलिया) और कौए भी सर्दी में नजर नहीं आ रहे हैं। पूरे जनवरी माह में तेज सर्दी और घना कोहरा छाए रहने के बाद जब 29 जनवरी की सुबह गुनगुनी धूप निकली तो पखेरुओं ने भी अपनी चहचहाहट से इसका स्वागत किया और अपने पर हवा में खोल दिए। इस बदलाव को पक्षी विज्ञानियों ने ही नहीं आम लोगों ने भी महसूस किया है। इन पक्षियों की घटती संख्या का कारण आदमी की बदलती जीवन शैली और पर्यावरणीय बदलाव ही समझा जाता रहा है। इतना ही नहीं, बढ़ते तापमान के कारण कई प्रकार की वनस्पतियां खत्म हो जाने कारण गिद्ध जैसे विशाल पक्षी भी लुप्त होते जा रहे हैं। उत्तर भारत में बड़ी संख्या में दिखने वाले गिद्धों के झुण्ड अब दिखाई नहीं देते हैं। इसी तरह कौओं की संख्या में भी तेजी से गिरावट आ रही है। सोनचिरैया भी अब यदा-कदा ही दिखती है। पक्षियों की संख्या में निरंतर हो रही कमी की एक मुख्य वजह कृषि क्षेत्र में हो रहा कीटनाशकों का उपयोग भी है। पक्षियों के बिना हमारी संस्कृति अधूरी है। वेद-पुराणों में देवी-देवताओं का किसी न किसी पक्षी से जुड़ाव दिखाया गया है चाहे वह वाहन के रूप में हो या सहायक के रूप में। सीता की खोज में राम की सहायता करने वाले जटायु का भी रामायण में वर्णन है। फिर भी हम पक्षियों को बचाने के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गर्मियों में तो कुछ पक्षी प्रेमी अपनी घरों की छतों पर चुग्गा पानी रख देते हैं लेकिन कड़ाके की सर्दी से बचने को पक्षियों के लिए कोई उपाय नहीं किए जाते हैं। पहले कुछ पक्षी विज्ञानी यह मानते रहे हैं कि पक्षी मौसमी बदलाव को पहले भांप जाते हैं और वे अपना स्थान परिवर्तन कर लेते हैं लेकिन अब यह तथ्य निकल कर आया है कि मनुष्यों की संगत में रहने वाले क्षेत्रीय पक्षियों के लिए इस तरह के अनुमान लगाना मुश्किल होता है। यही वजह है वे प्रक्रति के प्रकोप का शिकार हो जाते हैं। मौसम का सही-सही अनुमान लगाने का माद्दा प्रवासी पक्षियों में अधिक देखने को मिलता है लेकिन लोगों के साथ रहने वाले आम पक्षियों के लिए मौसम के बदलते मिजाज को पहचानना आसान नहीं होता। इसकी कई कारण हैं। आदमी के व्यवहार में आने वाले इन घरेलू पक्षियों के खानपान में भी बदलाव आ गया है। महानगरों में उड़ान भरने वाले परिंदे पेट भरने के लिए दाना ही नहीं चुंगते आदमी की झूठन के रूप में बचने वाले लड्डू-पेड़े, दूध-जलेवी और चाइनीज फास्टफूड भी मजे से खाते हैं। |
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